अपनी बात ,आपके साथ

अपनी बात ,आपके साथ
समय की धारा बही जाती है। 
आप उसका कोई उपयोग कर सकते हैं। 
आप सिर्फ एक उपयोग करते हैं, स्थगित करने का। 
कल करेंगे, परसों करेंगे, छोड़ते चले जाते हैं 
इस भरोसे कि कल भी होगा! 
अपनी बात ,आपके साथ
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लेकिन कल कभी होता नहीं है।

कल कभी भी नहीं होता है। 
जब भी हाथ में आता है, तो आता है आज। 
और उसको भी कल पर छोड़ देते हैं। 
जीते ही नहीं, स्थगित किये चले जाते हैं। 
कल जी लेंगे, परसों जी लेंगे। 
फिर एक दिन द्वार पर मौत खड़ी हो जाती है, 
वह क्षण भर का अवसर नहीं देती है 
और तब हम पछताते हैं। 
वह सब जो स्थगित किया हुआ जीवन है, 
सब आपके सामने खड़ा हो जाता है 
कि क्या—क्या जी सकते थे, क्या हो सकता था, 
कितने अंकुर निकल सकते थे जीवन में, 
कितनी यात्रा हो सकती थी, वह कुछ भी न हो पायी।

तब पीछे लौटकर देखते हैं 
तो कुछ तिजोरियों में रुपये दिखायी पड़ते हैं,
जिनको भर लिया, जीवन के मूल्य पर। 
कुछ लड़के —बच्चे दिखायी पड़ते हैं,
जिनको बड़ा कर लिया जीवन के मूल्य पर। 
वे चारों तरफ बैठे हैं खाट के और सोच रहे हैं 
कि चाबी किसके हाथ लगती है। 
रो रहे हैं, लेकिन ध्यान चाबी पर है। 
इनको बड़ा कर लिया जीवन के मूल्य पर। 
हिसाब —किताब, खाता —बही, बैंक सब चलेगा। 
आप हट जायेंगे। 
आपका खाता किसी और के नाम हो जायेगा। 
आपका मकान किसी और का निवास स्थान बन जायेगा। 
आपकी आकाक्षाएं किन्हीं और की बन जायेंगी, 
उन पर सवार हो जायेंगी और आप बिदा हो जायेंगे। 
और आपने सारे जीवन, जो भी मूल्यवान था, 
उसको स्थगित किया।
अपनी बात ,आपके साथ

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